माटी कि महक न्यूज़ किशनगढ़/महिला दिवस पर विशेष @रिपोर्ट भैरुसिंह चौहान
महिलाएं सदियों से साहस, शक्ति और धैर्य की प्रतिमूर्ति रही हैं। वे सिर्फ घर और परिवार नहीं संभालतीं, बल्कि जब बात अपने सपनों को पूरा करने की आती है, तो वे असंभव को भी संभव कर दिखाती हैं। ऐसी ही एक प्रेरणादायक महिला हैं सुमन राठी, जिन्होंने अपने दृढ़ संकल्प और हौसले से न केवल खुद को बल्कि अन्य महिलाओं को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है।सुमन राठी पेशे से एक वकील हैं, लेकिन उनका जुनून उन्हें सीमाओं से परे ले जाता है। वह एक पर्वतारोही और मैराथन धावक भी हैं। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने पैंगोंग झील, लद्दाख में 14,270 फीट की ऊंचाई पर स्थित दुनिया की सबसे ऊंची जमी हुई झील पर 42.2 किमी की मैराथन पूरी की। यह केवल एक दौड़ नहीं थी, बल्कि यह उनके संकल्प, आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति का प्रतीक थी।आइए जानते हैं, सुमन राठी की इस प्रेरणादायक यात्रा के बारे में, जिसमें संघर्ष, साहस और सफलता की अद्भुत कहानी छिपी है
सुमन राठी: एक साधारण महिला से अद्वितीय पर्वतारोही त
सुमन राठी राजस्थान के अजमेर जिले मार्बल सिटी किशनगढ़ की बेटी और भीलवाड़ा की बहू हैं। वे एक मध्यमवर्गीय परिवार से आती हैं, जहां बचपन से ही उन्होंने दृढ़ निश्चय और मेहनत के संस्कार सीखे। उनके पिता एडवोकेट धनराज जैथलिया एक प्रतिष्ठित वकील है, जिनसे सुमन को न्याय और सच्चाई के लिए खड़े होने की प्रेरणा मिली।शादी के बाद वे मुंबई में बस गईं और तीन बच्चों की मां हैं। लेकिन उनके भीतर का जुझारूपन और कुछ नया करने की चाह हमेशा बनी रही। उनके पति सी.ए. मुकेश राठी ने हमेशा उनका साथ दिया और उन्हें प्रोत्साहित किया कि वे अपने सपनों को पूरा करें।
38 साल की उम्र में दौड़ने का सफर शुरू किया
आमतौर पर लोग यह मान लेते हैं कि 30-35 की उम्र के बाद नए लक्ष्य तय करना और शारीरिक रूप से कठिन कार्य करना संभव नहीं होता। लेकिन सुमन राठी ने इस धारणा को तोड़ दिया।उन्होंने 38 साल की उम्र में मैराथन दौड़ना शुरू किया और देखते ही देखते यह उनके जुनून में बदल गया। रोजाना 5 किलोमीटर की दौड़ उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गई। इस दौरान उन्होंने कई मैराथन और अल्ट्रा मैराथन में भाग लिया और अपने साहस का परिचय दिया।
दुनिया की सबसे ऊंची जमी हुई झील पर दौड़ने का सपना
पैंगोंग झील: दुनिया की सबसे ऊंची फ्रोज़न लेक मैराथन
लद्दाख की पैंगोंग त्सो झील न केवल अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर है, बल्कि यह सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण स्थान है। यह भारत-चीन सीमा पर स्थित है और तापमान -35 डिग्री तक गिर सकता है। इस झील की खास बात यह है कि यह सर्दियों में पूरी तरह से जम जाती है और इसकी सतह पर दौड़ना किसी चुनौती से कम नहीं होता।सुमन राठी के लिए यह सिर्फ एक मैराथन नहीं थी, बल्कि यह एक सपने को साकार करने का अवसर था। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी और 14,270 फीट की ऊंचाई पर 42.2 किमी की मैराथन पूरी की। यह एक अद्भुत उपलब्धि थी, जिसे पूरा करने के लिए शारीरिक और मानसिक शक्ति की आवश्यकता थी।
विश्व रिकॉर्ड और इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज
दुनिया में सबसे लंबे समय तक ट्रीपोज़ करने का रिकॉर्ड पैंगोंग त्सो झील पर
सुमन राठी ने न केवल इस चुनौतीपूर्ण मैराथन को पूरा किया, बल्कि उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची जमी हुई झील पर सबसे लंबे समय तक ट्रीपोज़ (वृक्षासन) करने का एक विश्व रिकॉर्ड भी बनाया।यह एक ऐतिहासिक क्षण था, जिसे इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स ने मान्यता दी। इस रिकॉर्ड के साथ उन्होंने साबित किया कि महिलाओं के लिए कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है।
एवरेस्ट बेस कैंप की सफलता
सुमन राठी की उपलब्धियाँ यहीं तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने अपने जुड़वा बच्चों के साथ 2024 में एवरेस्ट बेस कैंप भी पूरा किया। उनके बच्चों ने "एवरेस्ट बेस कैंप पर चढ़ने वाले सबसे कम उम्र के जुड़वां बच्चों" का रिकॉर्ड बनाया, जिसे इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स द्वारा मान्यता दी गई और "एवरेस्ट बेस कैंप पर सबसे तेज गति से पहुंचने वाले जुड़वां बच्चों" का रिकॉर्ड बनाया, जिसे इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स द्वारा मान्यता दी गई। यह यात्रा न केवल उनके साहस को दर्शाती है, बल्कि यह भी सिद्ध करती है कि मातृत्व और व्यक्तिगत लक्ष्य साथ-साथ पूरे किए जा सकते हैं।
एवरेस्ट बेस कैंप की यह चढ़ाई उनके लिए एक और उपलब्धि थी, जिसने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
सफलता के पीछे संघर्ष और मेहनत कठिन परिस्थितियों में भी हौसला बनाए रखा
मैराथन और पर्वतारोहण केवल शारीरिक चुनौती नहीं होते, बल्कि यह मानसिक शक्ति की भी परीक्षा लेते हैं। सुमन राठी को इस सफर में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा - अत्यधिक ठंड, ऑक्सीजन की कमी, कठिन ट्रेनिंग और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ।लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से मजबूत बनाया और रोजाना कठिन अभ्यास किया।
परिवार का समर्थन और प्रेरणा
इस यात्रा में उनके पति सी.ए. मुकेश राठी ने हमेशा उनका साथ दिया। जब वे किसी मैराथन या ट्रेक के लिए जाती थीं, तो उनके पति उन्हें प्रोत्साहित करते और उनकी सभी तैयारियों में मदद करते। यह साबित करता है कि जब परिवार का साथ होता है, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता।
महिलाओं के लिए प्रेरणा: "अपने भीतर की ताकत को पहचानो"
सुमन राठी की कहानी केवल उनकी सफलता की गाथा नहीं है, बल्कि यह हर महिला के लिए प्रेरणा है। वे सभी महिलाओं से कहना चाहती हैं -
"अपने भीतर की ताकत को पहचानो। अपने सपनों को पूरा करने के लिए अपने डर को पीछे छोड़ो। जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी अपने लक्ष्य प्राप्त किए जा सकते हैं।"वे इस बात का जीवंत उदाहरण हैं कि शादी और बच्चों के बाद भी महिलाएं अपने सपनों को पूरा कर सकती हैं।
निष्कर्ष: अजेय नारी की मिसाल
सुमन राठी की यह कहानी केवल एक व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि यह नारी सशक्तिकरण का एक उदाहरण है। उनकी उपलब्धियाँ हमें यह सिखाती हैं कि यदि मन में ठान लिया जाए, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता।उनका यह सफर हर उस महिला के लिए प्रेरणा है, जो अपने सपनों को पूरा करना चाहती हैं। सुमन राठी एक जीवंत उदाहरण हैं कि महिलाएं वास्तव में अजेय, मजबूत और शक्तिशाली हैं।
माटी की महक न्यूज़ टीम की और से महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

