माटी की महक न्यूज़ किशनगढ़। सुनील सागर महाराज ने सन्मति समवशरण में शुक्रवार को प्रवचन देते हुए कहा कि खुद से बेखबर लोग बेहोश होते हैं, जो खुद से भी क्षमा नहीं मांग सकते। होश में रहने वाला ही क्षमा मांग सकता है। बेर बड़ाने से बेर बड़ता है और क्षमा मांगने से क्षमा बढ़ती है। क्षमा लेने देने की चीज नहीं होती है। झुकने पर दुनिया अपने आप झुक जाएगी। आप कोई भी झुकने को तैयार नहीं है इसलिए समाज व देश का विनाश हो रहा है। विश्व को मैत्री दिवस और जियो और जीने दो की जरूरत है। इंसान का अहंकार बुरा है। जो हो रहा है वह भगवान की मर्जी से हो रहा है यदि इंसान के समझ में आ जाए तो आपस का दंगा पसाद खत्म हो जाएगा। जैन लोग मानते हैं कि प्रत्येक आत्मा स्वतंत्र है इसलिए किसी को दुख नहीं देना चाहिए। बने बनाए भगवान का भरोसा नहीं करना चाहिए। जो पुरुषार्थ करके विकारों और वासनाओं को नष्ट करके भगवान बनते हैं उनको मानना चाहिए। बाह्य बुद्धि छोड़कर अपनी आत्मा को जानने का प्रयास करो। अंतर्रात्तमा दस धर्म के साथ क्षमा धर्म को स्वीकार करते हुए तप की साधना से विकारों को छोड़कर सिद्ध भगवान बन जाते हैं। तप का आनंद अलग होता है। भविष्य में जो करना है वह आज ही करना लाभदायक है। ज्ञानी व्यक्ति अपनी आत्मा को तन, वचन, द्रव्य मन से भिन्न मानता है। परिवार व समाज को चलाने के लिए खट्टा मीठा होना पड़ता है। अहिंसा, संयम तप सबसे बड़ा धर्म है और जिस जीवन में यह धर्म होता है उसे देवता भी प्रणाम करते हैं। देह का उपयोग साधना के लिए करना चाहिए। क्षमावान बना सबसे बड़ा गुण होता है। वर्षायोग समिति के प्रचार प्रसार प्रभारी संजय जैन ने बताया कि श्रीजी का अभिषेक, शांतिधारा एवं आचार्यश्री के पाद प्रक्षालन करने का सौभाग्य संपतराज, अजीत, कालूराम, दौलतराम, संजय, दीपक, आशीष कासलीवाल कालू वाले, रोहित, पूनम झांझरी, नवरतन परिवार, प्रतापगढ़ को मिला। कार्यक्रम में पर्युषण पर्व के दौरान दस उपवास करने वाले तपस्वियों का सम्मान किया गया। शुक्रवार को आचार्य श्री सुनील साकेत जी महाराज को आहार देने का सौभाग्य पदम कुमार, संजय कुमार, राजकुमारी, नैतिक, प्रिंसी जैन को मिला। दोपहर में सामयिक, स्वाध्याय, शाम को पण्य पुच्छा एवम आरती की गई। इस दौरान अनेक श्रद्धालु मौजूद रहे।
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