माटी की महक न्यूज़ किशनगढ़।आचार्य सुनील सागर महाराज ने सन्मति समवशरण में सोमवार को प्रवचन देते हुए कहा कि तर्क करने से रास्ते मिलते हैं एवं टकरार करने से फासले बढ़ाते हैं। जिसको तत्व की रुचि नहीं वह समझता नहीं है इसलिए स्वयं से भी मुलाकात करनी चाहिए। ज्ञान, दर्शन, सुख, आनंद आदि अनंत गुणों का पिंड होता है। जब तक अपने शुद्ध तत्व की तरफ दृष्टि नहीं होगी तब तक किसी प्रकार की तत्व की समझना बेकार है। धर्म, आत्मा को पकड़ने के लिए भाग रहे हैं वह गलत है। बाहर की यात्रा करो लेकिन भीतर आत्म स्वरूप की यात्रा करने पर ही जीवन सार्थक होगा। धर्म की क्रिया करने से धर्म नहीं मिलेगा, तत्व ज्ञान को पकड़ने पर धर्म स्वतः आ जाएगा। इंसान 33 करोड़ देवताओं की श्रद्धा करते हैं लेकिन आत्म स्वरूप की नहीं करते। जिस दिन आत्म स्वरूप पर श्रद्धा कर लेंगे उस दिन से करोड़ों देवताओं को माने या श्राद्धन करने की जरूरत नहीं होगी। भगवान को मानते हो और भगवान की नहीं मानते तो जीवन बेकार है। परमात्मा पर विश्वास करने पर स्वर्ग मिलता है और निज आत्मा पर श्राद्धन करने पर मोक्ष मिलता है। कर्म तो इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में भी भोगने पड़ेंगे। जिनवाणी कहती है कि दुनिया को बहुत जान लिया अब स्वयं को जानने की जरूरत है। दुनिया को समझने के बजाय स्वयं को समझ जाओगे तो बेड़ा पार हो जाएगा। वर्षायोग समिति के प्रचार प्रसार प्रभारी संजय जैन ने बताया कि श्रीजी का अभिषेक, शांतिधारा एवं आचार्यश्री के पाद प्रक्षालन करने का सौभाग्य नरेंद्र, अरविंद शाह, मुंबई को मिला। दोपहर में सामयिक, स्वाध्याय, शाम को पण्य पुच्छा एवम आरती की गई। इस दौरान अनेक श्रद्धालु मौजूद रहे।
