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सवाई माधोपुर/टोंक ( चन्द्रशेखर शर्मा)।
राष्ट्रपति से सम्मानित एवं प्रदेश के जाने-माने ब्रह्मऋषि पंडित सुरेश शर्मा का विगत दिवस टोंक जिले में स्थित सुप्रसिद्ध जन आस्था के केन्द्र श्री डिग्गी कल्याण मंदिर (मालपुरा) में विप्र फाउंडेशन की ओर से अभिनन्दन किया गया। परम शिष्य जतिन पारीक ने इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि, विप्र फाउंडेशन मालपुरा के पदाधिकारियों ने मालपुरा स्थित डिग्गीपुरी श्रीकल्याण मंदिर में पहुंचकर ब्रह्मऋषि पंडित सुरेश शर्मा का शाॅल ओढ़ा व माल्यार्पण कर तथा श्रीफल भेंट कर अभिनन्दन एवं सम्मान किया। आपको बता दें कि काली टोपी वाले बाबा व त्रिकालदर्शी के नाम से प्रसिद्ध 75 वर्षीय शर्मा इन दिनों श्रीकल्याण मंदिर डिग्गीपुरी में अपने सहयोगियों एवं शिष्यों के साथ गीता के मूल पाठ कर रहे हैं। अभिनंदन के समय पंडित विनय शर्मा, तहसील अध्यक्ष पं कन्हैया लाल शर्मा, उपाध्यक्ष पं अरविंद त्रिपाठी, संगठन मंत्री पं. बुद्धिप्रकाश शर्मा एवं पं. गिरिराज शर्मा आदि विप्रवर उपस्थित थे।                           परम श्रद्धेय ब्रह्मऋषि पं. श्री  सुरेश जी महाराज को अपने शिष्यों,परम भक्तों, अनुयायियों एवं अन्य लोगों द्वारा करौली के संत, डुंण्डीपुरा (राजस्थान) वाले गुरुजी, गांधीजी, ब्रह्मर्षि (ब्रह्म ऋषि), ज्योतिषी, ज्योतिषज्ञ, त्रिकालदर्शी (भूत, वर्तमान एवं भविष्य तीनों काल के बारे में बताने वाले), सद्गुरु व काली टोपी वाले तथा गुरुजी आदि नामों की उपाधियों से नवाजा एवं पहचाना जाता है।


  गुरुजी का संक्षिप्त जीवन परिचय 

गुरुजी का अब से पूर्व जीवन  काफी समय कष्टमय एवं दुविधापूर्ण परिस्थितियों में गुजरा है। पिताजी कड़ी शहर जिला मेहसाणा गुजरात में सरकारी नोकरी (ONGC) में थे, गुरुजी की पढ़ाई किशोरावस्था में मेहसाणा गुजरात में हुई एवं तरुणावस्था में मामा के पास करौली राजस्थान में रहे।कुछ समय अहमदाबाद गुजरात में खेती बाड़ी भी की, लेकिनलागत मूल्य भी वसूल नहीं कर पाए। क्योंकि विधाता ने गुरुजी के लिए कुछ और ही सोच रखा था, शायद उनके भाग्य में संत जीवन ही लिखा था, अन्ततोगत्वा अपनी 21 वर्ष की आयु में गुरूजी का संत जीवन प्रारम्भ हुआ। इस दौरान गुरूजी ने निम्नांकित जगहों पर मुख्य रूप से अपना संत जीवन बिताया।


संत निवास समय एवं कार्यकाल

सर्व प्रथम पं.सुरेश मिश्रा  खाक चौक मन्दिर, कड़ी जिला मेहसाणा (गुजरात) में आधा दशक से अधिक समय तक रहे।

इसके बाद घंटेश्वर, गऊ घाट, रणथम्भौर जंगल (राजस्थान) में भी तीन वर्ष के लगभग समय बिताया। उन्होंने गिर गिरनार जंगल, गुजरात में भी 6 वर्ष तक रहकर भगवान की तपस्या की। कालांतर में वे श्री मदन मोहन  मन्दिर, करौली (राजस्थान) में रहे यहां लगभग सवा दशक तक रूककर उन्होंने श्री मदन मोहन जी का साक्षात्कार किया। कैला देवी मन्दिर में भी रहकर उन्होंने ने कैला मैया का भरपूर आशिर्वाद प्राप्त किया।


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