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आशीष मिश्रा |
ये शेर दहाड़ता क्यों है...
नई संसद पर लगे शेरों को लेकर आपत्ति है। किन्हें है। जो विपक्ष में हैं। किसी को नए शेर हिंसक लग रहे हैं। किसी को आदमखोर। किसी को बेडौल और खतरनाक। किन लोगों ने आपत्ति की है। वही जो इन शेरों को बिल्ली जैसा देखने के आदी थे।
अशोक स्तंभ के शेर दिखाकर नए शेरों की तुलना कर रहे हैं। ट्वीट कर रहे हैं। मीडिया में बहस कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर तर्कों की बौछार कर रहे हैं। सम्राट अशोक को शांति का प्रतीक चिन्ह ही तय करना था तो गाय बिठा देते। गधा बकरी या बिल्ली का इस्तेमाल कर लेते। शेर क्यों। क्योंकि शेर भले मुस्कुराता हुआ हो, या दहाड़ता। शेर शेर होता है। जंगल का राजा। बड़े से बड़ा जानवर उससे कांपता है।
सवाल क्या है। यही कि अशोक स्तंभ पर अंकित शेर सौम्य थे। ये वाले भयानक हैं। सही है। आप चाहते ही यह थे कि हमारा देश शेर की खाल ओढ़े भीगी बिल्ली सा ही रहे। चोला उतार दिया गया है। शेर अपने असली रूप में हैं। अशोक ने अपने चिन्ह से यही कहना चाहा कि राजा का ताकतवर होना, शांतिप्रिय होना और चतुर्दिक की खबर रखना बहुत जरूरी है। आज के भारत की डिमांड भी यही है। प्रधानमंत्री ताकतवर हो। शांतिप्रिय हो। चारों तरफ उसकी शक्ति और नजर समान हो।
दहाड़ते शेर आज की जरूरत हैं। शास्त्रों में कहा गया है। भय बिनु होय न प्रीति। शेर दहाड़ कर ही अपनी पहचान साबित करता है। उसका नख दंत विहिन स्वरूप या तो सर्कस में अच्छा लगता है या चिड़ियाघर में। भारत अब न तो सर्कस रहा है और न ही चिड़ियाघर। जंगल का राजा जैसा होना चाहिए, अब वैसा ही है।
अशोक के शेरों ने जब दहाड़ना बंद कर दिया तो कबाइलियों के हौसले बढ़े, अफगानी गुंडों के हौसले बढ़े, मुगलों, तुर्कों, मंगोलियंस और ब्रिटिश के हौसले बढ़े, कश्मीर में आतंकियों, चीनियों के हौसले बढ़े, नक्सलियों वामपंथियों के हौसले बढ़े। अराजक तत्वों, बदमाशों, बाहुबलियों के हौसले बढ़े। शेर अब दहाड़ने लगा है। अपनी अस्मिता के लिए इसे दहाड़ते ही रहना चाहिए था। बल्कि जरूरत पड़ने पर पिछले पंजों के बल खड़े हो जाना चाहिए था, बल्कि अपनी दहाड़ में अपने निवालों में उन क्रूर दांतों का खौफ कायम करना चाहिए था, बल्कि जरूरत पड़ने पर चारों दिशाओं में शिकार पर छलांग लगानी चाहिए थी।
यही तो मतलब था विजय स्तंभ का। बुद्ध के मुस्कुराने से अगर शांति की स्थापना होती तो श्रीलंका जल न रहा होता, अफगान के बामियान में तोपें न चल रही होती, इंडोनेशिया अपनी मौलिकता न खोता, चीन जमीनों का इतना भूखा न होता।
मुझे ये दहाड़ते हुए शेर पसंद आए। लग रहा है कि सदियों से इन्हें मुंह बंद करके बैठने की सजा दी गई थी। अब इनके कान में किसी ने कह दिया है - तुम शेर हो, सारा जंगल तुम्हारा है।
(संकलन: चन्द्रशेखर शर्मा, 'माटी की महक'न्यूज)

