माटी की महक न्यूज़ किशनगढ़। गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में चातुर्मास के दौरान जैन भवन में आयोजित तत्वार्थ सूत्र शिक्षण शिविर में धर्मोपदेश देते हुए आर्यिका विभाश्री माताजी ने कहा कि किसी भी ग्रंथ को अध्ययन करने से पूर्व हमें छः बातें जान लेना चाहिए। मंगल, निमित्त, हेतु, परिमाण, नाम व कर्त्ता। उन्होंने इन छः बातों को विस्तार से बताते हुए कहा कि जो ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं वह सदैव प्रमाणित होना चाहिए। ग्रंथ भव्य जीवो के निमित्त से लिखा हुआ होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अपने इष्ट देवता के स्मरण, गुणस्तवन अथवा नमस्कार आदि को मंगल करते हैं। मोक्ष की प्राप्ति अथवा भव्य जीवों के कल्याण के लिए ग्रंथो की रचना की जाती है। श्रावक के दो मुख्य कर्तव्य होते हैं। दान व पूजा। जिस घर में दिगंबर मुनि के चरण पड़ते हैं वही घर, घर होता है। जिस घर में मुनियों व संतो के चरण नहीं पढ़ते तो शमशान भूमि की तरह हुआ करता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने प्रतिदिन का मंगलाचरण जिनेंद्र भगवान का दर्शन करके करना चाहिए। जिससे हमारे दिन भर के सभी कार्य मंगल हो। मीडिया प्रभारी संजय जैन के अनुसार बुधवार को प्रातः प्रतिक्रमण, सामायिक, मंगल पाठ, स्वाध्याय, जिन सहस्त्रनाम, जिनाभिषेक, शांतिधारा, ईर्यापथ भक्ति, सामयिक, मौन साधना, छहढाला कक्षा, संघ स्वाध्याय, प्रतिक्रमण, भक्तामर पाठ, आरती, आनंदयात्रा, भक्तामर कक्षा सहित विभिन्न धार्मिक व सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। आर्यिका माताजी ससंघ के सान्निध्य में प्रत्येक रविवार को प्रातः 6 बजे से मुनिसुव्रतनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में बच्चों को अभिषेक, शांतिधारा व पूजन करने की शिक्षा प्रदान की जाएगी।
