आलेख- चन्द्रशेखर शर्मा
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी पर करवा चौथ का पर्व मनाया जाता है। इस व्रत में चौथ मैया की पूजा की जाती है और उनका आशीर्वाद लिया जाता है। चौथ माता हिन्दू धर्म की प्रमुख देवी मानी जाती है जो स्वयं माता पार्वती का ही एक रूप है। चौथ माता का एक मंदिर भी है, जो राजस्थान के सवाई माधोपुर में पहाड़ की एक चोटी पर स्थित है। चौथ माता का मंदिर सबसे प्राचीन और सुप्रसिद्ध है
राजस्थान में है सबसे पुराना चौथ माता मंदिर
देश का सबसे पुराना चौथ माता मंदिर लगभग 567 साल पुराना है। ये मंदिर राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के चौथ का बरवाड़ा नाम के कस्बे में स्थित है। इस मंदिर की स्थापना 1451 में वहां के शासक भीम सिंह ने की थी। करवा चौथ का त्योहार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। इस व्रत में चौथ माता की पूजा की जाती है और उनसे सुहागिन स्त्रियां अपने सुहाग की रक्षा के लिए प्रार्थना करती हैं। चाैथ माता गौरी देवी का ही एक रुप है। इनकी पूजा करने से अखंड सौभाग्य का वरदान तो मिलता ही है साथ ही दाम्पत्य जीवन में भी सुख-समृद्धि बढ़ती है।
करीब 1 हजार फीट ऊंची पहाड़ी पर है अवस्थित है मंदिर
चौथ माता मंदिर राजस्थान के सवाई माधोपुर के सबसे प्रमुख मंदिरों में से एक है। इस मंदिर की स्थापना 1451 में वहां के शासक भीम सिंह ने की थी।
1463 में मंदिर मार्ग पर बिजल की छतरी और तालाब का निर्माण कराया गया। इस मंदिर में दर्शन के लिए राजस्थान से ही नहीं अन्य राज्यों से भी लाखों की तादाद में श्रद्धालु आते हैं।
नवरात्र के दौरान यहां होने वाले धार्मिक आयोजनों का विशेष महत्व है। करीब एक हजार फीट ऊंची पहाड़ी पर विराजमान चौथ माता जन-जन की आस्था का केन्द्र है।
चढ़नी पड़ती हैं 700 सीढ़ियां
शहर से 35 किमी दूर एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित यह मंदिर जयपुर शहर के आसपास का एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण है।
मंदिर सुंदर हरे वातावरण और घास के मैदान के बीच स्थित है। सफेद संगमरमर के पत्थरों से स्मारक की संरचना तैयार की गई है। दीवारों और छत पर शिलालेख के साथ यह वास्तुकला की परंपरागत राजपूताना शैली के लक्षणों को प्रकट करता है।
मंदिर तक पहुंचने के लिए 700 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। देवी की मूर्ति के अलावा, मंदिर परिसर में भगवान गणेश और भैरव की मूर्तियां भी दिखाई पड़ती हैं।
शुभ काम का पहला निमंत्रण माता को
ढ़ूढ़ाण एवं हाड़ौती क्षेत्र के लोग हर शुभ कार्य से पहले चौथ माता को निमंत्रण देते हैं। प्रगाढ़ आस्था के कारण बूंदी राजघराने के समय से ही इसे कुल देवी के रूप में पूजा जाता है। माता के नाम पर कोटा में चौथ माता बाजार भी है। कोई संतान प्राप्ति तो, कोई सुख-समृद्धि की कामना लेकर चौथ माता के दर्शन को आता है। मान्यता है, कि माता सभी की इच्छा पूरी करती हैं।
मन्दिर की यात्रा का समय
वैसे से इस मंदिर की यात्रा साल में कभी भी की जा सकती है, लेकिन नवरात्र और करवा चौथ के समय यहां जाने का विशेष महत्व माना जाता है। नवरात्र में यहां मेल लगता है। इसके अलावा किसी भी समय यहां अपने पति की लंबी उम्र और सुखी दाम्पत्य जीवन की कामना के लिए जा सकते हैं। मंदिर में जल रही अखंड ज्योति मुख्य आकर्षण
मंदिर में सैकड़ों साल से एक अखण्ड ज्योति भी जल रही है। दर्शनार्थियों की संख्या के आधार पर यह मंदिर राजस्थान के 11 सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में शुमार है। वैसे तो यहां पर हर दिन भक्तजनों की भीड़ रहती है लेकिन करवा चौथ पर एक अलग ही नजारा देखने को मिलता है।
करवा चौथ पर करते हैं माता के दर्शन
सवाई माधोपुर में करवा चौथ, भाद्रपद चौथ, माघ चौथ और लक्खी मेला पर लाखों श्रद्धालु आते हैं और माता के दर्शन करते हैं। करवा चौथ के दिन चौथ माता के मंदिर को दुल्हन की तरह सजाया जाता है। यहां मान्यता है कि करवा चौथ के दिन माता के दर्शन और पूजा करने से अखंड सौभाग्य का वरदान मिलता है और दांपत्य जीवन में भी सुख बढ़ता है। मन्दिर से जुड़ी किंवदंती एवं इतिहास। चौथ का बरवाड़ा का सम्पूर्ण इतिहास चौथ माता शक्ति पीठ के इर्द गिर्द घूमता है, इस गाँव में चौथ भवानी का भव्य मंदिर है जो अरावली शक्ति गिरि पहाड़ श्रृंखला के ऊपर 1100 फीट की ऊँचाई पर स्थित है, इस मंदिर की स्थापना महाराजा भीमसिंह चौहान ने संवत 1451 में बरवाड़ा के पहाड़ पर की। वर्तमान चौथ का बरवाड़ा को प्राचीन काल में "बरवाड़ा" नाम से जाना जाता था जो कि रणथम्भौर साम्राज्य का ही एक हिस्सा रहा है, इस क्षेत्र के प्रमुख शासकों में बीजलसिंह एवं भीमसिंह चौहान प्रमुख रहे हैं।
बरवाड़ा क्षेत्र के पास चौरू एवं पचाला जो कि वर्तमान में गाँव बन गए हैं वो प्राचीन काल में घनघौर जंगलों में आदिवासियों के ठहरने के प्रमुख स्थल थे। चौथ माता की प्रथम प्रतिमाका अनुमान चौरू जंगलों के आसपास माना जाता है। एक किंवदंती के अनुसार कहाँ जाता है कि प्राचीन काल में चौरू जंगलों में एक भयानक अग्नि पुंज का प्राक्ट्य हुआ, जिससे दारूद भैरो का विनाश हुआ था। इस प्रतिमा के चमत्कारों को देखकर जंगल के आदिवासियों को प्रतिमा के प्रति लगाव हो गया और उन्होंने अपने कुल के आधार पर चौर माता के नाम से इसकी पूजा करने लगे, बाद मे चौर माता का नाम धीरे धीरे चौरू माता एवं आगे चलकर यही नाम अपभ्रंश होकर चौथ माता हो गया। कहाँ जाता है कि इस माता को सर्वप्रथम चौर अर्थात कंजर जाति के लोगों ने अपनी कुलदेवी के रूप में पूजा था, बाद में आदिवासियों ने भी इसे ही अपनी आराध्या देवी के रूप में माना जो कि मीणा जनजाति से संबंधित थे। यही कारण रहा है कि चौथ माता को आदिवासियों मीणाओं की कुलदेवी के रूप में जाना जाने लगा। वर्षों बाद चौथ माता की प्रतिमा चौरू के विकट जंगलों से अचानक विलुप्त हो गई, जिसका परमाण सही रूप से कहना बड़ा मुश्किल है, मगर इसके वर्षों बाद यही प्रतिमा बरवाड़ा क्षेत्र की पचाला तलहटी में महाराजा भीमसिंह चौहान को स्वप्न में दिखने लगी, लेकिन भीमसिंह चौहान ने इसे अनदेखा कर दिया। कहाँ जाता है कि एक बार महाराजा भीमसिंह चौहान को रात में स्वप्न आया कि शिकार खेलने की परम्परा को मैं भूलता जा रहा हूँ, इसी स्वप्न की वजह से महाराजा भीमसिंह चौहान ने शिकार खेलने जाने का निश्चय किया, महाराजा भीमसिंह चौहान बरवाड़ा से संध्या के वक्त जाने का निश्चय किया एवं शिकार करने की तैयारी करने लगे। भीमसिंह चौहान की रानी का नाम रत्नावली था। कहा जाता है कि रत्नावली ने राजा भीमसिंह चौहान को शिकार पर नहीं जाने के लिए बहुत मना किया, मगर भीमसिंह ने यह कहकर बात को टाल दिया कि "चौहान एक बार सवार होने के बाद शिकार करके ही नीचे उतरते हैं"। इस प्रकार रानी की बात को अनसुनी करके भीमसिंह चौहान अपने सैनिकों के साथ घनघौर जंगलों की तरफ कूच कर गए। शाम का समय था लेकिन भीमसिंह चौहान जंगलों में शिकार की खोज हेतु बढ़ते ही रहे, यकायेक महाराजा भीमसिंह चौहान की नज़र एक मृग पर पड़ी और उन्होंने मृग का पीछा करना शुरू कर दिया, सैनिक भी राजा के साथ बढ़ने लगे, लेकिन जंगलों में रात हो जाने के कारण सभी सैनिक आपस में एक दूसरे से भटक गए। महाराजा भीमसिंह ने रात हो जाने के कारण मृग का पीछा आवाज को लक्ष्य बनाकर करने का निश्चय किया और मृग की ओर बढ़ते चले गए। मृग धीरे धीरे भीमसिंह चौहान की नजरों से ओझल हो गया। जब तक राजा के सभी सैनिक राजा से रास्ता भटक चुके थे। भीमसिंह चौहान ने चारों तरफ नजरें दौड़ाई मगर उसके पास कोई भी सैनिक नहीं रहा और पानी के श्रौत को खोजने लगे क्योंकि उनको प्यास बहुत सताने लगी थी। बहुत कोशिश के बाद भी जब पानी नहीं मिला तो भीमसिंह चौहान मूर्छित होकर जंगलों में गिर पड़े। भीमसिंह को स्वप्न में पचाला तलहटी में वही प्रतिमा दिखने लगी। तभी अचानक भयंकर बारिश होने लगी एवं मेघ गरजने लगे व बिजली कड़कने लगी, जब राजा की बारिश के कारण मूर्छा टूटी तो राजा देखता है कि चारों तरफ पानी ही पानी नजर आया, राजा ने पहले पानी पिया और देखा कि एक बालिका अंधकार भरी रात में स्वयं सूर्य जैसी प्रकाशमय उज्ज्वल बाल रूप में कन्या खेलती नजर आई. भीमसिंह चौहान उस कन्या को देखकर थोड़ा भयभीत हुआ और बोला कि हे बाला इस जंगल में तुम अकेली क्या कर रही हो? तुम्हारे माँ बाप कहाँ पर है, राजा की बात को सुनकर नन्ही बालिका हँसने लगी और तोतरी वाणी में बोली कि हे राजन तुम यह बताओ की तुम्हारी प्यास बुझी या नहीं, इतना कहकर भगवती अपने असली रूप में आ गई , इतना होते ही राजा माँ के चरणों में गिर गया और बोला हे आदिशक्ति महामाया मुझे आप से कुछ नहीं चाहिए अगर आप मुझ पर खुश हो तो हमारे क्षेत्र में आप हमेशा निवास करें ! राजा भीमसिंह चौहान को माता चौथ ने कहाँ हे राजन तुम्हारी इच्छा पूरी होगी, यह कहकर भगवती शिवमाया अंतर्ध्यान हो गई. जहाँ पर महामाया लुप्त हुई वहाँ से राजा को चौथ माता की प्रतिमा मिली। उसी चौथ माता की प्रतिमा को लेकर राजा बरवाड़ा की ओर चल दिया, बरवाड़ा आते जनता को राजा ने पूरा हाल बताया और संवत 1451 में आदिशक्ति चौथ भवानी की बरवाड़ा में पहाड़ की चोटी पर माघ कृष्ण चतुर्थी को विधि विधान से स्थापित किया, तब से लेकर आज तक इसी दिन चौथ माता का मेला भरता है जिसमें लाखों की तादाद में भारतवर्ष से भगत जन माँ का आशीर्वाद लेने आते रहते है। भीमसिंह चौहान के लिए उक्त कहावत आज भी चल रही है:- चौरू छोड़ पचालो छोड्यों, बरवाड़ा धरी मलाण, "भीमसिंह चौहान कू, माँ दी परच्या परमाण
इस प्रकार चौथ माता के नाम पर बरवाड़ा क्षेत्र आगे आगे चौथ का नाम जोड़कर महाराजा भीमसिंह चौहान ने इस क्षेत्र का नया नाम रख दिया चौथ का बरवाड़ा।
सुहाग पूजा के लिए भारतवर्ष में प्रसिद्ध चौथ माता के मंदिरों में सबसे अधिक ख्याति प्राप्त चौथ का बरवाड़ा स्थित चौथ माता शक्ति पीठ माना जाता है, इसलिए चौथ का बरवाड़ा को शक्ति नगर के नाम से पुकारना अतिश्योक्ति नहीं होगा, चौथ माता का प्रथम स्थान चौरू, द्वितीय पचाला गाँव रहा है वहीं संवत 1451 से वर्तमान तक यह मंदिर चौथ का बरवाड़ा पर स्थित है। चौथ माता को चोरों व कंजरो की कुलदेवी माना जाता है एवं आदिवासियों में मीणा जनजाति के नारेड़ा गौत्र की कुलदेवी के रूप में चौथ माता जी को विशेष स्थान प्राप्त है आज भी मीणा जाति के नारेड़ा गौत्र में नवरात्रि पूजा के समय माता के प्रतीक के रूप में त्रिशूल एवं नाहर के पुत्र नारेड़ा के रूप में नाहर का पंजा बनाकर पूजने की प्रथा प्राचीन समय से चली आ रही है। किंवदंतियों के अनुसार मीणा समाज का बारवाल गौत्र भी चौथ माता को अपनी कुलदेवी मानता है। कई वर्षों बाद इंदौर घराने के शासक मल्हार राव होल्कर ने सवाई माधोपुर में सेना एकत्रित करके जयपुर पर आक्रमण करने की योजना बनाई। जब होल्कर जयपुर की तरफ बढ़ने लगा तो बीच मेंबरवाड़ा के ठाकुर ने होल्कर को समझना चाहा कि जयपुर से संधि कर ले युद्ध नहीं, उक्त कथन इस प्रकार था :- सुणो होल्कर बात मम,जासी अपणों ठाव, "जैपर जीतो बाद थे, पहली हमरो गाव बरवाड़ा के ठाकुर कि इस बात को सुनकर होल्कर भड़क गया और घमंड पूर्वक इस प्रकार बोला :- पान की बीड़ी चाबकर, थुकत लागै बार, "गढ़ बरवाड़ा भेद द्यू , म्हारों नाम मल्हार
अंत में दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध जारी हो गया, बरवाड़ा दरबार हारने वाला था कि "चौथ माता चमत्कार हुआ और सम्पूर्ण गढ़ पर आग की लपट उठने लगी, मल्हार राव होल्कर को चौथ भवानी का रूद्र रूप चारों ओर दिखाई देने लगा, जिससे होल्कर घबरा गया और अपनी सेना सहित इंदौर की तरफ नंगे पैर भाग गया।
चौथ माता की आँट चौथ का बरवाड़ा में महाराज फतेहसिंह के समय राठौड़ वंश के राजा विद्रमा की बारात चौथ का बरवाड़ा गाँव की कच्ची बस्ती में आई थीं महाराज विद्रमा का शत्रु इस मौके का पूरा फायदा उठाना चाहता था, उसने इसी मौके को देखकर बरवाड़ा की कच्ची बस्ती में आई विद्रमा की बारात पर विशाल सेना लेकर हमला बोल दिया, अचानक हुए आक्रमण से राजा विद्रमा संभल नहीं पाया एवं निशस्त्र होने की वजह से सम्पूर्ण बारात सहित लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुए ! इस घटना के दिन सोमवार का वार एवं अक्षय तृतिया आखातीज का पर्व था ! सम्पूर्ण बरवाड़ा क्षेत्र में शोक की लहर छा गई ! इसी दिन महाराज फतेहसिंह ने घोषणा कि, " यह एक दुर्भाग्यपूर्ण ऐतिहासिक घटना है, मैं शपथ लेता हूँ कि आज के दिन से सम्पूर्ण बरवाड़ा सहित एवं बरवाड़ा क्षेत्र के अधीन 18 गाँवों में अक्षया तृतिया को विवाह नहीं किया जाएगा और तेल की कढ़ाई तक इस दिन नहीं चढ़ाई जाएगी, साथ मेंसोमवार के दिन अपनी बहुँ बेटियों को अपने ससुराल नहीं भेजा जाएगा, जो इन्ह बातों पर ध्यान नहीं देगा उसे चौथ माता की भक्ति प्राप्त नहीं होगी, यही शपथ आज श्री चौथ माता की आँट (कसम) कहलाती है ! तब से लेकर आज तक बरवाड़ा के अधीन 18 गाँवों में अक्षया तृतिया को विवाह नहीं किए जाते एवं सोमवार को अपनी बहुँ बेटियों को बाहर गाँव, ससुराल या मांगलिक कार्यों में भी नहीं भेजा जाता है ।
सूरजन हाड़ा व चौथ माता
चौथ माता प्राचीन काल से प्रसिद्ध व चमत्कारिक प्रतिमा रही है, बूँदी नरेश सूरजन हाडा को एक बार सम्पूर्ण शरीर में फाफूले नामक बीमारी हो गई थी, बहुत समय तक इस बीमारी से निजात नहीं मिली तो आखिर में उसकी पत्नी ने चौथ माता जी की आखा को लाल कपड़े में बाँधकर राजा कि कलाई में बाँधने मात्र से फायदा पड़ गया, उस समय सुरजन हाड़ा रणथम्भौर साम्राज्य का राजा था, इस बीमारी के मिटने के बाद सुरजन हाडा ने चौथ माता देवी को अपनी आराध्य देवी मान लिया, सूरजन हाडा ने बरवाड़ा स्थित चौथ माता का हाडौती क्षेत्र में मे खूब प्रचार करवाया !, यही कारण है कि आज भी चौथ का बरवाड़ा स्थित चौथ माता मंदिर के दर्शनों हेतु लाखों की तादाद में हाड़ौती से दर्शनार्थी आते है और चौथ माता हाडौती की लोकदेवी के रूप में प्रसिद्ध हो गई, यही कारण है कि चौथ माता हाडौती क्षेत्र में घर घर में मे पूजी जाती है !
चौथ माता संबंधी विविध तथ्य • सवाई मानसिंह द्वितीय को द्वितीय विश्व युद्ध में चौथ माता के सुमरन मात्र से ही सुध बुध बैठी थी, इन्हीं के चमत्कार की वजह से द्वितीय विश्व युद्ध से मानसिंह निकल कर आएं थे, जब सवाई मानसिंह द्वितीय विश्व युद्ध से आए तो इन्होंने सन् 1944 में चौथ माता सरोवर के पास विशाल शिव लिंग की स्थापना करवाई थी ! • 1759-60 ईस्वी के लगभग जयपुर के महाराजा सवाई माधोसिंह ने चौथ भवानी के विवादित प्रश्नों को जानने की इच्छा सवाई माधोपुर में की थीं ।
किंवदंतियों के अनुसार
चौथ माता की प्रतिमा सन 1332 के लगभग चौरू गाँव स्थित थी !
1394 ईस्वी के लगभग चौथ माता मंदिर की स्थापना बरवाड़ा में की गई थी
1567-68 के समय सुरजन हाडा ने चौथ माता देवी का हाडौती क्षेत्र में भारी प्रचार प्रसार करवाया था ।
ब्यूरो चीफ जिला सवाई माधोपुर दौसा, माटी की महक न्यूज़